पटना : कहते है एक कोख से बहन-भाई का जन्म लेना ही रिश्ता नहीं कहलाता, कुछ रिश्ते कच्चे धागों से भी बनते हैं। विश्वास के डोर रूपी धागे और स्नेह के आवरण समय के साथ इस कदर मजबूत हो जाते है कि भौतिक दूरिया भी भाई-बहन के बीच दीवार नही बन पाती है।दरअसल,रक्षा-बंधन यानि–रक्षा का बंधन,एक ऐसा रक्षा सूत्र जो भाई को सभी संकटों से दूर रखता है।यह त्योहार भाई-बहन के पवित्र रिश्ते के स्नेह, विश्वास और पावन बंधन का प्रतीक है।तभी तो किसी ने बेहद सटीक लिखा है ….
तोड़े से भी ना टूटे, ये ऐसा मन बंधन है, इस बंधन को सारी दुनिया कहती रक्षा बंधन है।
बिहार के लाल और बिहार कैडर के ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी व देश के बेहद चर्चित आईपीएस अधिकारियों में शुमार विकास वैभव किसी परिचय के मोहताज नही है। इनके व्यक्तित्व की आभा चहुओर फैली है। बतौर एक आईपीएस इनकी कर्मठता का डंका जहाँ भी रहे खूब बज़ा व पुरजोर बज़ा। सूबे के आम आदमी के बीच इनकी लोकप्रियता का कहना ही क्या। अपने कर्तव्यों के प्रति इनका समर्पण और कानून के राज को समाज के अन्तिम अंतिम पायदान तक पहुचाने की कवायद ने इन्हें आम आदमी के बीच बेहद मक़बूल बना दिया है। विकास वैभव एक विश्वास का नाम बन गए है। इसका जीता जागता उदाहरण दिखाई दिया भारतीय त्योहारों में से एक अति प्राचीनतम त्योहार रक्षाबंधन के सुअवसर पर। जब एक बहन को “कच्चे धागे” ने ऐसा जोड़ दिया की भाई “वैभव” से दूर होने पर उसने कम्प्यूटर स्क्रीन पर भाई की तस्वीर की पूरे मनो योग से न केवल आरती उतारी बल्कि भावना के धागे से बने पावन बंधन रूपी राखी भी बाँधी। इस स्नेह के अतिरेक और नन्ही बहन के निर्मल निश्छल भावना के धागे से बने पावन बंधन रूपी राखी के मर्म को साझा करते हुए महज यही लिखा जा सकता है कि माटी के लाल आईपीएस विकास वैभव एक विश्वास का प्रतीक बन चुके है।