नालंदा विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास को पांच खंडों में संरक्षित करने की मांग

नालंदा
राजगीर (नालंदा)।
नालंदा विश्वविद्यालय के नवनियुक्त कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी को एक महत्त्वपूर्ण ज्ञापन सौंपा गया है, जिसमें नालंदा के समग्र साहित्य एवं इतिहास का पाँच विस्तृत खंडों में संचयन, लेखन, अभिलेखन एवं प्रकाशन करवाने की माँग की गई है। यह मांग राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ स्मृति न्यास के अध्यक्ष श्री नीरज कुमार द्वारा की गई है।
श्री नीरज ने पत्र में कहा है कि नालंदा न केवल भारत का, बल्कि पूरे विश्व का एक अद्वितीय प्राचीन ज्ञान केन्द्र रहा है। नालंदा विश्वविद्यालय का गौरवशाली अतीत उसे विश्व का सबसे प्राचीन आवासीय विश्वविद्यालय बनाता है, जहां चीन, जापान, तिब्बत, ईरान सहित अनेक देशों से विद्यार्थी ज्ञानार्जन के लिए आते थे। यहाँ धर्मशास्त्र, तर्कशास्त्र, खगोलशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, दर्शन आदि की उच्च स्तरीय शिक्षा दी जाती थी।
उन्होंने उल्लेख किया कि प्रसिद्ध चीनी यात्रियों ह्वेनसांग और इत्सिंग ने भी नालंदा की महिमा को विस्तार से वर्णित किया है। साथ ही, यह भी बताया गया कि नालंदा विश्वविद्यालय के विशाल पुस्तकालय – रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक – में लाखों पांडुलिपियाँ एवं दुर्लभ ग्रंथ संचित थे, जिनकी ख्याति विश्व भर में थी।
पत्र में इस बात पर चिंता जताई गई है कि नालंदा के निर्माण, विध्वंस और पुनर्निर्माण की समग्र प्रामाणिक जानकारी आज भी एकत्र नहीं हो पाई है, जो कि विश्व के बौद्धिक समुदाय के लिए अत्यंत दुखद है। अतः वर्तमान कुलपति से अपील की गई है कि वे अपने कार्यकाल में नालंदा के इस समग्र इतिहास को दस्तावेज़ के रूप में संरक्षित करने की पहल करें।
श्री नीरज ने इसे भारत को पुनः “विश्वगुरु” के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए इसे सांस्कृतिक एवं बौद्धिक पुनर्जागरण की आवश्यकता बताया है।
यह ज्ञापन भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, बिहार के राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान, मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार तथा विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को भी प्रेषित किया गया है।